!! बाण का घाव भर जाता है पर वाणी का घाव कभीभी नहीं भरता!!****************************************" हम लोग अपने हाथों से उतनीहिंसा नहीं करते जितनी वाणी से करते हैं . व्यंग्यात्मक भाषा में बोलना भी हिंसा का कार्य है . बाण का घाव भर जाता है पर वाणी काघाव कभी भी नहीं भरता. इसलिए हम सदैव जो भी बोलें उन शब्दों के प्रभावों को ध्यान में रखकर , सोच-समझकर बोलें, बोलने से पहले यह सोच लें कि जो मैं बोलने जा रहा हूँ उससे किसी प्रकार का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कोईनुकसान तो नहीं हो रहा है . नुकसान किसी देश, समाज या व्यक्ति विशेष का हो सकता है."